Monday, 5 March 2018

सक्सेस पानी है तो तोड़िए कम्फर्ट जोन की जंजीरें!


हेलो दोस्तों 
       एक कप चाय, मौसम के अनुरूप गर्म या ठंडा कमरा, आरामदेह बिस्तर और कानों में धीमा संगीत। क्या इससे बेहतर जिन्दगी हो सकती है। यकीनन आप का उत्तर होगा, “नहीं”।

अब एक मिनट ठहरिये और सोचिये… अगर हेमशा ऐसा ही रहे तो क्या इससे बद्तर जिंदगी हो सकती है। यकीनन इस बार भी आप का उत्तर होगा, “नहीं” । थोड़ी देर के लिए तो यह सब अच्छा लगता है। पर अगर ऐसे ही रहना पड़े तो यह बहुत दर्दनाक है। क्यों है ना ? हाँ, क्योंकि इस जिंदगी में कोई विकास नहीं है, कोई संभावना नहीं है, कोई ऐडवेंचर नहीं है।
याद है जब हम लोग बचपन में अपने मम्मी – पापा की अँगुली पकड़ कर मेला देखने जाते थे तो रोलर कोस्टर में चढने में बहुत मजा आता था। कभी ऊपर, बहुत ऊपर तो कभी नीचे बहुत नीचे। वो मजा जमीन पर एकसमान चलने में कहाँ। पर बड़े होते ही हम अपने को कटघरे में बंद करना शुरू कर देते हैं-

हमसे ये नहीं हो सकता, हमसे वो नहीं हो सकता। फिर मोनोटोनस जिन्दगी से ऊब कर खामखाँ में ईश्वर को दोष देते रहते हैं। उसने पड़ोसी को सब कुछ दिया है पर हमारे भाग्य में… ?

आपने ये कहावत सुनी होगी, “ऊपर वाला जब भी देता है छप्पर फाड़ कर देता है। ” लेकिन जरा सोचिये कि अगर आप का छप्पर ही छोटा हो तो बेचारे ईश्वर भी क्या कर पायेंगे। यहाँ छप्पर से मेरा तात्पर्य झोपड़ी या महल की छत से नहीं है बल्कि सोच से है। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर आप छोटा सोचते हैं या किसी भी बदलाव से इंकार करते हैं तो आप जीवन में तरक्की नहीं कर पायेंगे।
कहा भी गया है कि “change is the only constant.. केवल परिवर्तन ही अपरिवर्तनशील है “।
फिर भी कई लोग बातें तो बड़ी -बड़ी करेंगें पर अपने जीवन में परिवर्तन जरा सा भी स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे लोग नयी परिस्तिथियों को स्वीकार न कर पाने की वजह से आने वाले हर मौके को गँवा देते हैं। फिर निराशा और अवसाद से घिर जाते हैं। कभी सोचा है, क्यों होता हैं ऐसा ? इसके पीछे बस एक ही कारण है उनका कम्फर्ट जोन।


क्या है ये कम्फर्ट जोन?

किसी भी इंसान का बदलाव को अस्वीकार करने का सीधा सा अर्थ है कि वो बने –बनाये ढर्रे में चलना चाहता है जिसे हम सामान्यत : कम्फर्ट जोन कहते हैं। हम इसमें जीने की इतनी आदत डाल लेते हैं कि उसके इतर कुछ सोचते ही नहीं। ये कम्फर्ट जोन, सीमित सोच का एक छोटा सा दायरा है जिसे हमने अपने चारों और खींचा हुआ है। इतने संकरे दायरे से हमारा यह लगाव, हमारे संकल्पों में डर की मिलावट कर देता है। हम इस दायरे से बाहर कुछ भी स्वीकार करने से डरते हैं।

वास्तव में देखा जाए तो कम्फर्ट जोन एक ख़ास मानसिक अवस्था है।हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इसमें इतनी बुरी तरह से जकड़े हुए होते हैं कि जब हम इसके अंदर रहते हैं तो हमें किसी एक्साइटमेंट का गहरा अनुभव नहीं होता ….न उत्साह, न जोश, न् जूनून, न ही प्रेम,न ही लगाव,न ही डर, न घबराहट,न दुःख, न सुख। सब कुछ यंत्रवत।

सुबह उठे ब्रश किया,नाश्ता किया ऑफिस गए,रुटीनल काम किया, घर आये खाना खाते हुए टी.वी देखा और सो गए। या यूं कहे जिंदगी एक ढर्रे में कटती है। इसलिए स्ट्रेस लेवल बहुत कम रहता है। क्योंकि जब भी हम कुछ नया सोचते हैं करना चाहते हैं या किसी उपरोक्त भावों में से किसी भाव को गहराई से फील करते हैं तो हमारा स्ट्रेस लेवल बढ़ जाता है।

कैसे बनती है ये कम्फर्ट जोन?

एक नन्हा सा बच्चा हमेशा कुछ नया करना चाहता है, हर काम अलग –अलग तरीके से करना चाहता है। तुरंत, माता –पिता टोकते हैं नहीं ऐसे नहीं करते। स्कूल जाता हैं टीचर टोकती हैं नहीं ऐसे नहीं करते। बड़े भाई-बहन बताते है उसकी क्या बात सही है क्या गलत है, यह सिलसिला पूरी जिंदगी चलता रहता है। बच्चा वही करने लगता है जो दूसरे कहते हैं क्योंकि उसके अन्दर से डर जाता है कि अगर वो, वो सब नहीं करेगा जो कहा जा रहा है तो समाज में सबसे अलग –थलग, अटपटा सा लगेगा, लोग उसका नकारात्मक मूल्याङ्कन करेंगे। उसे समा द्वारा अस्वीकार किये जाने का भय बैठ जाता है।

कभी –कभी पेरेंट्स और टीचर्स अपनी बात मनवाने के लिए बच्चे को मार कर, सजा देकर उस पर दवाब डालते हैं। धीरे –धीरे बच्चा सोसाइटी के बनाये हुए कानून पर चलने लगता है। कुछ हद तक यह सही भी है कि इस तरह वो एक समाज द्वारा स्वीकृत नागरिक बन जाता है। पर वही बच्चा बड़ा होकर समाज द्वारा अस्वीकृत होने के भय से कुछ भी नया करने से डरता है।

पापा ने कहा है डॉक्टर बनना है…. सो बनना है। भले ही मन आर्टिस्ट बनने का कर रहा हो। शादी मम्मी की पसंद से करनी है।भले ही अपने द्वारा पसंद की गयी लड़की/ लड़के को सारी उम्र के लिए भूलना पड़े।

बड़ी बेरहमी से दबा दी जाती है भावनाएं कुछ नया या अपनी इच्छा से कुछ करने की क्योंकि लोग क्या कहेंगे का भय मन पर हावी रहता है।

क्यों तोडें कम्फर्ट जोन?

क्योंकि तभी आप अपने असली मूल्य का पता लगा सकते हैं… क्योंकि तभी आप अपने अन्दर छिपी आपार सम्भावनाओं को पहचान सकते हैं। जरा सोचिये अगर एक नदी अपने आराम के लिए सिर्फ सीधी रेखा में चलती तो क्या वो कभी सागर तक पहुँच पाती? नहीं, इसीलिए वो जहाँ काट पाए पत्थर को काट देती है,जहाँ पत्थर नहीं कट सका वहाँ धारा की दिशा बदल देती है, कहीं जरूरत समझी तो थोड़ा सा उलटी दिशा में बह कर अनुकूल स्थान देख कर वापस सही दिशा ले लेती है। नदी हमें सीखाती है अपने कम्फर्ट जोन को तोड़कर हर परिस्तिथि में हर तरीके से आगे बढ़ना… अपने लक्ष्य तक पहुंचना।

कम्फर्ट जोन तोड़ने के फायदे

आप के काम की क्षमता बढ़ जाती है।
जीवन में जब कुछ अचानक से नया घट जाता है तो आप उस के साथ आप आसानी से अनुकूलन बिठा लेते हैं।
अगर आप भविष्य में कुछ नया करना चाहते हैं तो आसानी से कर सकते हैं।
आप अपनी रचनात्मकता को आसानी से बढ़ा सकते है।
सबसे ख़ास बात, आप जिंदगी काटते नहीं जीते हैं।
क्यों मुश्किल है कम्फर्ट ज़ोन तोडना : एक महत्वपूर्ण प्रयोग

कम्फर्ट जोन को लेकर एक बड़ा ही प्रसिद्द प्रयोग हुआ। उसमें पाया गया कि जब हम कम्फर्ट जोन में रहते हुए काम करते हैं तो हमारे तनाव का लेवल सामान्य रहता है। इसे मिनिमम एंग्जायटी लेवल भी कह सकते हैं। इसमें हम आराम से जीते हैं। अगर हम इससे बाहर निकलने के लिए स्ट्रेस का लेवल थोड़ा बढ़ा ले तो हमारी परफोर्मेंस में सुधार आता है। यह स्थान हमारे कम्फर्ट जोन के जस्ट बाहर होता है जिसे मैक्सिमम एंग्जायटी लेवल कहते हैं। यानी इतने स्ट्रेस को हमारा शरीर आसानी से बर्दाश्त कर सकता है। इसमें हमारी बेस्ट परफोरमेंस रहती है। इसके बाद अगर स्ट्रेस लेवल बढती है तो परफोर्मेंस कम होती जाती है। एक लेवल के बाद एंग्जायटी बढ़ने पर परफोर्मेंस जीरो हो जाती है।यहां समझने की बात ये है कि हर मनुष्य स्वभावतः जीरो स्ट्रेस लेवल में रहना चाहता है।

अगर आप स्ट्रेस लेवल थोड़ा बढ़ाएंगे तो परफोर्मेंस सुधरेगी व् परिणाम सकारात्मक आयेंगे। लेकिन अगर आप अचानक से स्ट्रेस लेवल ज्यादा बढ़ा देंगे तो परिणाम नकारात्मक आयेंगे। ज्यादातर लोगों के साथ यह होता है कि वो बहुत ऊँचे लक्ष्य बना कर एक साथ अपनी सारी ताकत झोक देते हैं पर इतना स्ट्रेस झेल नहीं पते हैं। फिर वो काम आधा ही छोड़ कर वापस कम्फर्ट जोन में आ जाते हैं। इसीलिए कम्फर्ट जोन तोड़ना बहुत मुश्किल होता है।

कैसे तोड़े कम्फर्ट जोन?


ऊपर के प्रयोग से स्पष्ट है कि अगर आपने जिंदगी को एक ख़ास तरीके से जीने की बहुत गंभीर आदत बना ली है तो इसका सीधा सादा अर्थ हुआ कि आप अपनी कम्फर्ट जोन में कैद हो गए हैं।अगर भाग्य ने करवट बदली और अचानक से आप को जिंदगी में कुछ नया कुछ बेहतर करने का अवसर मिला तो आप कर नहीं पायेंगे। आप का एंग्जायटी लेवल इतना बढ़ जाएगा कि आप स्ट्रेस बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे और वापस अपने कम्फर्ट जोन में आ जायेंगे।

ऐसे उदाहरण आपने देखे होंगे कि कई बार दूसरे शहर में नौकरी मिलने पर घर में पूरी तरह आराम से रहे बच्चे नौकरी छोड़ कर वापस आ जाते हैं, या मायके में नाजो पाली गयी लड़कियाँ ससुराल में काम का प्रेशर बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं। जीवन से अनुकूलन करने के लिए जरूरी
है आप अपनी कम्फर्ट जोन को एक्सटेंड करते रहें । कुछ तरीके हैं जिससे आप आसानी से अपनी कम्फर्ट जोन से बाहर आ सकते हैं। आइये देखते हैं इन्हें:


बढाएं छोटे –छोटे कदम:


जरूरत है बड़े काम को छोटे –छोटे टुकड़ों में बाँट कर धीरे –धीरे स्ट्रेस लेवल बढ़ाते हुए आगे बढ़ा जाए। इससे आप की कम्फर्ट जोन एक्सटेंड होती रहेगी। जैसे कि अगर आप को लोगो से बात करने में झिझक होती है तो पहली बार सिर्फ मिलने पर सिर्फ स्माइल के साथ हेलो कहे,अगली बार एक, दो लाइन की बात करे। कम्फर्ट जोन से बाहर आने के लिए जरूरी है आप अपने डर पहचाने और उन्हें दूर करने की दिशा में रोज़ एक –एक स्टेप बढ़ते जाए।

कभी-कभी चीजों को अलग ढंग से करें:

आप रोजाना के अपने कामों को अलग ढंग से करे। कई लोगो को अपनी तकिया की ही इतनी आदत हो जाती है कि उसके बिना उन्हें नींद नहीं आती है। इसलिए कभी–कभी दूसरे कमरे मे सोएं। अलग रास्ते से ऑफिस जाएं। उस दुकान से खरीदारी करिए जिससे आज तक नहीं की। एक हफ्ते कोई ख़ास चीज न खाने का प्रण कीजिये या कोई चीज अलग ढंग से बनाइये। धीरे–धीरे आप पाएंगे कि आप नयी परिस्तिथियों को अपनाने में ज्यादा दिक्कत महसूस नहीं करेंगे।

दो मिनट में निर्णय का नियम:


अगर आप परिस्तिथियों का बहुत देर तक आंकलन कर के निर्णय लेते हैं तो बहुधा आप निर्णय नहीं ले पाते। आपकी कम्फर्ट जोन आप को अनिर्णय की स्तिथि में छोड़ देती है और आप सफलता की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। आज कौन सी सब्जी बनेगी… दो मिनट में सोचिये। दो शर्ट्स में से कौन सी ले दो मिनट में फैसला, कौन से नए रास्ते से जाए दो मिनट में निर्णय लीजिये। इससे आप 2 मिनट के अंदर सारी परिस्तिथि का आंकलन करेंगे और आपका दिमाग तेज –तेज चलेगा।

नयी–नयी जगहों का देखने जाइए:


पराया शहर,पराया देश पराये लोग जब आप किसी दूसरे शहर में घूमने जाते हैं तो आप को कई अनुकूलन करने पड़ते हैं जैसे मौसम से,आबोहवा से,खाने –पीने से। जब आप बार –बार दूसरे शहरों में जाते है तो आप की कम्फर्ट जोन पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी होती है ऊपर से लौट कर आने पर आप ढेर सारे अनुभव ले कर आते हैं। यानी एक के साथ एक फ्री। है न मजेदार।

सीखिए कुछ नया:

दुनियाँ में इतना ज्ञान है, अगर रोज़ आप ऑफिस या घर के उन्ही –उन्ही कामों में सर खपाए रहेंगे तो कम्फर्ट जोन में कैद हो जायेंगे। कुछ नया सीखिए। नए विषयों की किताबें पढ़िए, नयी भाषा सीखिए, कार चलाना, फोटो ग्राफी कुछ भी पर हमेशा कुछ नया सीखते रहिये।फिर देखिये आपकी मोनोटोनस जिन्दगी का ट्रैक कैसे बदलता है।

तो क्या आप अपने कम्फर्ट जों की जंजीरें तोड़ने को तैयार हैं? क्या आप ग्रो करने और अपना पोटेंशियल रियलाइज़ करने के लिए रेडी हैं… तो क्यों न ये तोड़ – फोड़ आज ही से शुरू हो जाए!

धन्यवाद,

Thursday, 1 March 2018

कहीं आपकी डिग्री आपके सपने तो नहीं तोड़ रही ?

हेलो दोस्तों
           इस article का title आपको थोडा अटपटा लग सकता है . क्योंकि generally इंसान बड़ी-बड़ी डिग्रीयां लेकर तो बड़े बड़े सपने पूरे करता है , कोई MBBS की degree लेकर Doctor बनने का सपना तो कोई Engineering की degree लेकर Engineer बनने का सपना , और मैं इन्ही के द्वारा सपने टूटने की बात कर रहा हूँ!!
मेरा सवाल ये है कि आज आप जो हैं, क्या आपने ही वो बनने का सपना देखा था या आपको जबरदस्ती वो सपना दिखाया गया था ??
मैं एक middle class family से हूँ और बचपन से मेरे मित्र -यार भी ऐसे ही परिवारों से रहे हैं ; और ज्यादातर लोग जो इस blog को पढ़ते हैं वो भी ऐसे ही परिवारों से होते हैं ….शायद आप भी . ऐसे घरों में पढाई -लिखी को विशेष महत्त्व दिया जाता है , अक्सर parents यही expect करते हैं कि उनके बच्चे Engineer/ Doctor बने . और ये बात बच्चे के दिमाग में इतनी बैठा दी जाति है कि वही उसका सपना बन जाता है . इस process में कई बच्चे सचमुच उस सपने को अपना बना लेते हैं और इसी क्षेत्र में आगे चल कर बड़े बड़े काम करते हैं .पर समस्या वहां आती है जब आपके mature होने के साथ साथ आपके अपने सपने जन्म लेने लगते हैं …ऐसे सपने जिसका उस पढ़ाई लिखी से कोई सीधा वास्ता नहीं होता . For example: Computer Engineering कि पढ़ाई करके किसी अच्छी IT company में काम करने वाला बंदा अपना Restaurant खोलने का सपना देख सकता है , कोई MBA करके किसी multinational company में काम करने की बजाये किसी NGO में काम करने की सोच सकता है , कोई Doctor किसी हॉस्पिटल में operation करने की बजाये Artist बनने का dream देख सकता है.

पर अधिकतर लोग ऐसे कदम नहीं उठा पाते क्योंकि उनका उनकी degree उनके सामने आ जाती है , उनके मन में कुछ ऐसे विचार आ सकते हैं :
“ मैंने तो Engineering की है , इतनी अच्छी नौकरी कर रहा हूँ , अब इस field को छोड़ कर Restaurant खोलूँगा तो लोग क्या कहेंगे .”
“ अगर मैंने Artist बनने के बारे में किसी से बोला तो लोग मुझे पागल समझेंगे . .मेरी पढ़ाई में इतने पैसे लगे हैं …इतना वक़्त लगा है …it’s not possible to change my profession.”

और वो लोग खुद को समझा लेते हैं की जो होता है अच्छा होता है , मेरी किस्मत में यही करना लिखा था …etc.
ज्यादातर लोग परिस्थितियों से समझौता क्यों कर लेते हैं ?
क्योंकि ये करना आसान होता है …इसके लिए कोई risk नहीं उठाना पड़ता ,खुद को comfort zone से नहीं निकलना पड़ता …, इसके लिए हिम्मत नहीं चाहिए होती और साथ ही आप दुनिया की नजरो में एक normal इंसान बने रहते हैं .
अगर आप उन ज्यादातर लोगों में नहीं हैं तो बहुत अच्छी बात है ,आप अपने दिल की आवाज़ सुनकर सचमुच अपने और सोसाइटी के लिए अच्छा काम कर रहे हैं.और यदि आप उनमे से हैं जो अपने दिल की आवाज़ को दबा कर बैठे हों तो आपको सोचना होगा!!!!
सिर्फ अपने past decisions को सही ठहराने के लिए आप कब तक गलत future decisions लेते रहेंगे? जो डिग्री आपको आज़ाद करने की बजाये बांधे उसका भला क्या काम? और ऐसा भी नहीं है कि आप जो नया काम करने की सोच रहे हैं वहां आपका पिछला ज्ञान बिलकुल ही काम ना आये. वो भले आप directly ना use कर पाएं, पर किसी भी उच्च शिक्षा को हासिल करने में आपके brain का जो development होता है और आपका जो outlook broad होता है वो हर एक काम में आपकी मदद करेगा.
अपने चेहरे पर किसी और का मुखौटा लगा कर ज़िंदा तो रहा जा सकता है पर जिया नहीं जा सकता, एक fulfilling life जीने के लिए आपको अपने मन का काम चुनना होगा., कुछ ऐसे ही जैसा Harsha Bhogle ने , IIM Ahmedabad से MBA करने के बाद कुछ साल corporate world में काम तो किया पर खुद को अपने दिल की आवाज़ सुनने से नहीं रोक पाए और एक जाने-माने cricket commentator बन गए. Chetan Bhagat भी IIT और IIM से पढ़ाई करने के बाद एक author हैं. Samir Soni , University of California, Los Angeles से Economics. की पढाई करने के बाद as an Investment Banker काम करते थे पर आज वो acting की दुनिया में नयी ऊँचाइयाँ छू रहे हैं.
और आपको 3 Idiots का Farhaan (Madhavan ) तो याद होगा ही . उसने अपने पिता की इच्छा पूरी करते हुए Engineering तो कर ली पर Rancho की motivation ने finally उसे अपने दिल का काम करने की हिम्मत दे डाली और वो एक renowned wild life photographer बन गया.
इस movie की तरह असल ज़िन्दगी में भी आपके parents तभी सबसे ज्यादा खुश होते हैं जब आप खुद सबसे ज्यादा खुश होते हैं. और आप तभी सचमुच खुश और संतुष्ट हो सकते हैं जब आप अपने दिल की सुने.
दोस्तों जब आप सचमुच किसी चीज को पूरी शक्ति से चाहते हैं तो Law of Attraction अपना काम करने लगता है,भले शुरू में कोई आपका साथ ना दे पर यदि आप determined हैं तो धीरे-धीरे लोग आपको support करने लगते हैं और आपके सामने ऐसी opportunities आने लगती हैं जिसके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होता.
सपने देखना और उन्हें साकार करना सिर्फ आपको inner satisfaction ही नहीं देता बल्कि long term में financially भी ये कहीं अच्छा निर्णय साबित होता है. मैंने जो भी examples ऊपर लिए हैं , ये सभी लोग शायद नौकरी करके इतने पैसे नहीं कम पाते जितना वो अपने दिल का काम करते हुए कमा पा रहे हैं.
यदि आप भी किसी trap में फंसे हैं और अपनी degree का बोझ ढो रहे हैं तो उस बोझ को उतार फेंकिये,दोस्तों , Steve Jobs की कही ये बातें याद रखिये:
” आपका समय सीमित है, इसलिए इसे किसी और की जिंदगी जी कर व्यर्थ मत कीजिये. बेकार की सोच में मत फंसिए,अपनी जिंदगी को दूसरों के हिसाब से मत चलाइए. औरों के विचारों के शोर में अपनी अंदर की आवाज़ को, अपने intuition को मत डूबने दीजिए.
आपका काम आपकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा होगा, और truly-satisfied होने का एक ही तरीका है की आप वो करें जिसे आप सच-मुच एक बड़ा काम समझते हों. और बड़ा काम करने का एक ही तरीका है की आप वो करें जो करना आप enjoy करते हों. “
उम्मीद है ये बातें मेरी तरह आपको भी अपना दिल की सुनने की प्रेरणा देंगी.
All the best! May all your dreams come true .

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Thursday, 22 February 2018

बिल गेट्स की सफलता की कहानी

हैलो दोस्तों
          आज हम फिर एक बार आपके समक्ष एक ऐसे मनुष्य की जीवनी (Biography) लेकर प्रस्तुत हैं जिन्होंने अपने जीवन में अपनी कड़ी मेहनत से न केवल सफलता के शिखर को छुआ, अपितु इतनी प्रसिद्धि भी प्राप्त की कि वह कई लोगों के प्रेरणा स्रोत बन गए – इनका नाम है “बिल गेट्स” (Bill Gates) |
बिल गेट्स को किसी परिचय कि आवश्यकता नहीं है, वह पूरी दुनिया में अपने कार्यों से जाने जाते हैं | हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ Software Company “Microsoft” की नींव भी Bill Gates के द्वारा ही रखी गयी है |आइये आज हम आपको बिल गेट्स की जीवनी (Bill Gates Biography in Hindi) की विस्तार पूर्वक जानकारी देते हैं |

बिल गेट्स का परिवार (Family of Bill Gates)

बिल गेट्स का वास्तविक तथा पूर्ण नाम विलियम हेनरी गेट्स (William Henry Gates) है | इनका जन्म 28 October, 1955 को वाशिंगटन के सिएटल में हुआ |
इनके परिवार में इनके अतिरिक्त चार और सदस्य थे – इनके पिता विलियम एच गेट्स जो कि एक मशहूर वकील थे, इनकी माता मैरी मैक्‍सवेल गेट्स जो प्रथम इंटरस्टेट बैंक सिस्टम और यूनाइटेड वे के निदेशक मंडल कि सदस्य थी तथा इनकी दो बहनें जिनका नाम क्रिस्टी और लिब्बी हैं |
Bill Gates ने अपने बचपन का भी भरपूर आनंद लिया तथा पढ़ाई के साथ वह खेल कूद में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे |

बिल गेट्स का बचपन (Childhood of Bill Gates)

उनके माता – पिता उनके लिए क़ानून में करियर बनाने का स्वप्न लेकर बैठे थे परन्तु उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान तथा उसकी प्रोग्रामिंग भाषाओं में रूचि थी | उनकी प्रारंभिक शिक्षा लेकसाइड स्कूल में हुई | जब वह आठवीं कक्षा के छात्र थे तब उनके विद्यालय ने ऐएसआर – 33 दूरटंकण टर्मिनल तथा जनरल इलेक्ट्रिक (जी.ई.) कंप्यूटर पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम खरीदा जिसमें गेट्स ने रूचि दिखाई |
तत्पश्चात मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा जिसका नाम “टिक-टैक-टो” (tic-tac-toe) तथा इसका प्रयोग कंप्यूटर से खेल खेलने हेतु किया जाता था | Bill Gates इस मशीन से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा जानने को उत्सुक थे कि यह Software Codes किस प्रकार कार्य करते हैं |


कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के प्रति बिल गेट्स की लगन (Bill Gates Passion for Computer Programming)

इसके पश्चात गेट्स डीईसी (DEC), पीडीपी (PDP), मिनी कंप्यूटर (Mini Computer) नामक सिस्टमों में दिलचस्पी दिखाते रहे, परन्तु उन्हें कंप्यूटर सेंटर कॉरपोरेशन द्वारा ऑपरेटिंग सिस्टम में हो रही खामियों के लिए 1 महीने तक प्रतिबंधित कर दिया गया |
इसी समय के दौरान उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर सीसीसी के Software में हो रही कमियों को दूर कर लोगों को प्रभावित किया तथा उसके पश्चात वह सीसीसी के कार्यालय में निरंतर जाकर विभिन्न प्रोग्रामों के लिए सोर्स कोड का अध्ययन करते रहे और यह सिलसिला 1970 तक चलता रहा |
इसके पश्चात इन्फोर्मेशन साइंसेस आइएनसी. लेकसाइड के चार छात्रों को जिनमें Bill Gates भी शामिल थे, कंप्यूटर समय एवं रॉयल्टी उपलब्ध कराकर कोबोल (COBOL), पर एक पेरोल प्रोग्राम लिखने के लिए किराए पर रख लिया। इसके पश्चात उन्हें रोकना नामुमकिन था |
मात्र 17 वर्ष कि उम्र में उन्होंने अपने मित्र एलन के साथ मिलकर ट्राफ़- ओ- डाटा नामक एक उपक्रम बनाया जो इंटेल 8008 प्रोसेसर (Intel 8008 Processor) पर आधारित यातायात काउनटर (Traffic Counter) बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया |
1973 में वह लेकसाइड स्कूल से पास हुए तथा उसके पश्चात बहु- प्रचलित हारवर्ड कॉलेज (Harvard College) में उनका दाखिला हुआ | परन्तु उन्होंने 1975 में ही बिना स्नातक किए वहाँ से विदा ले ली जिसका कारण था उस समय उनके जीवन में दिशा का अभाव |
उसके पश्चात उन्होंने Intel 8080 चिप बनाया तथा यह उस समय का व्यक्तिगत कंप्यूटर (Personal Computer) के अन्दर चलने वाला सबसे वहनयोग्य चिप था, जिसके पश्चात बिल गेट्स को यह एहसास हुआ कि समय द्वारा दिया गया यह सबसे उत्तम अवसर है जब उन्हें अपनी स्वयं कि Company का आरम्भ करना चाहिए |

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का उत्थान (The rise of Microsoft Company)



MITS (Micro Instrumentation and Telemetry Systems) जिन्होंने एक माइक्रो कंप्यूटर का निर्माण किया था, उन्होंने गेट्स को एक प्रदर्शनी में उपस्थित होने कि सहमती दी तथा गेट्स ने उनके लिए अलटेयर एमुलेटर (Emulator) निर्मित किया जो Mini Computer और बाद में इंटरप्रेटर में सक्रिय रूप से कार्य करने लगा |
इसके बाद Bill Gates व् उनके साथी को MITS के अल्बुकर्क स्थित कार्यालय में काम करने कि अनुमति दी गयी | उन्होंने अपनी जोड़ी का नाम Micro-Soft रखा तथा अपने पहले कार्यालय कि स्थापना अल्बुकर्क में ही की | 26 नवम्बर, 1976 को उन्होंने Microsoft का नाम एक व्यापारिक Company के तौर पर पंजीकृत किया |
Microsoft Basic कंप्यूटर के चाहने वालों में सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया था | 1976 में ही Microsoft MITS से पूर्णत: स्वतंत्र हो गया तथा Gates और Allen ने मिलकर कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग भाषा Software का कार्य जारी रखा |
इनसे बाद Microsoft ने Albuquerque में अपना कार्यालय बंद कर Bellevue, Washington में अपना नया कार्यालय खोला | Microsoft ने उन्नति की ओर बढ़ते हुए प्रारंभिक वर्षों में बहुत मेहनत व् लगन से कार्य किया | गेट्स भी व्यावसायिक विवरण पर भी ध्यान देते थे, कोड लिखने का कार्य भी करते थे तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा लिखे गए व् जारी किये गए कोड कि प्रत्येक पंक्ति कि समीक्षा भी वह स्वयं ही करते थे |
इसके बाद जानी मानी Company IBM ने Microsoft के साथ काम करने में रूचि दिखाई, उन्होंने Microsoft से अपने पर्सनल कंप्यूटर के लिए बेसिक इंटरप्रेटर बनाने का अनुरोध किया |
कई कठिनाइयों से निकलने के बाद गेट्स ने Seattle Computer Products के साथ एक समझौता किया जिसके बाद एकीकृत लाइसेंसिंग एजेंट और बाद में 86-DOS के वह पूर्ण आधिकारिक बन गए और बाद में उन्होंने इसे आईबीएम को $80,000 के शुल्क पर PC-DOS के नाम से उपलब्ध कराया | इसके पश्चात Microsoft का उद्योग जगत में बहुत नाम हुआ |
1981 में Microsoft को पुनर्गठित कर बिल गेट्स को इसका चेयरमैन व् निदेशक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया | जिसके बाद Microsoft ने अपना Microsoft Windows का पहला संस्करण पेश किया | 1975 से लेकर 2006 तक उन्होंने Microsoft के पद पर बहुत ही अदभुत कार्य किया, उन्होंने इस दौरान Microsoft company के हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए |

बिल गेट्स का विवाह व् आगे का जीवन (Bill Gates Personal Life)

1994 में Bill Gates का विवाह फ्रांस में रहने वाली Melinda से हुआ तथा 1996 में इन्होंने जेनिफर कैथेराइन गेट्स को जन्म दिया | इसके बाद मेलिंडा तथा बिल गेट्स के दो और बच्चे हुए जिनके नाम रोरी जॉन गेट्स तथा फोएबे अदेले गेट्स हैं |
वर्तमान में बिल गेट्स अपने परिवार के साथ वाशिंगटन स्थित मेडिना में उपस्थित अपने सुन्दर घर में रहते हैं, जिसकी कीमत 1250 लाख डॉलर है |


बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का उदय (Rise of the Bill & Melinda Gates Foundation)

वर्ष 2000 में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (Bill and Melinda Gates Foundation) की नींव रखी जो कि पारदर्शिता से संचालित होने वाला विश्व का सबसे बड़ा Charitable Foundation था |
उनका यह Foundation ऐसी समस्याओं के लिए कोष दान में देता था जो सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ कर दी जाती थीं जैसे कि कृषि, कम प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यक समुदायों के लिये कॉलेज छात्रवृत्तियां, एड्स जैसी बीमारियों के निवारण हेतु, इत्यादि |

परोपकारी कार्य(Charitable Work)

सन 2000 में इस Foundation ने Cambridge University को 210 मिलियन डॉलर गेट्स कैम्ब्रिज छात्रवृत्तियों हेतु दान किये | वर्ष 2000 तक Bill Gates ने 29 बिलियन डॉलर केवल परोपकारी कार्यों हेतु दान में दे दिए |
लोगों की उनसे बढती हुई उम्मीदों को देखते हुए वर्ष 2006 में उन्होंने यह घोषणा की कि वह अब Microsoft में अंशकालिक रूप से कार्य करेंगे और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन में पूर्णकालिक रूप से कार्य करेंगे |
वर्ष 2008 में गेट्स ने Microsoft के दैनिक परिचालन प्रबंधन कार्य से पूर्णतया विदा ले ली परन्तु अध्यक्ष और सलाहकार के रूप में वह Microsoft में विद्यमान रहे |

आइये अब हम आपको बिल गेट्स की कुछ महत्वपूर्ण बातों से अवगत कराते हैं ;

1 -मात्र 13 वर्ष कि आयु में अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम टिक-टैक-टो लिखा |
2 -विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते हुए ही उन्होंने कंप्यूटर प्रोग्राम बनाकर 4,200 डॉलर कमा लिए |
3 -उन्होंने अपने अध्यापक से कहा था कि वह 30 वर्ष की आयु तक करोड़पति बन जाएंगे और मात्र 31 वर्ष की आयु में उन्होंने अरबपति बनकर दिखाया |
4 -फोर्ब्स की विश्व की सबसे अमीर लोगों की सूची में गेट्स का नाम लगातार 11 वर्षों तक पहले नंबर पर आता रहा |
5 -उन्होंने दो किताबें भी लिखीं – The Road Ahead और Business @ The Speed of Thought|
पूरे जगत की सबसे बड़ी Software Company की नींव बिल गेट्स द्वारा ही रखी गयी |

प्रिय मित्रों आपको हमारी यह Biography of Bill Gates in Hindi कैसी लगी वो कृपया Comment के माध्यम से हमें ज़रूर बताइयेगा, धन्यवाद। इस Article को Facebook, Twitter पर भी ज़रूर Share करें ।

Tuesday, 20 February 2018

संस्थापक स्टीव जॉब्स की प्रेरणादायक जीवनी

हैलो दोस्तों
          आज हम एक ऐसे अमीर व्यक्ति के बारे में बात कर रहें, जिन्हें न अपने पैसे से प्यार था और न ही पैसा उनकी पहचान थी ।वो इंसान जिसे अपने ही माता-पिता ने किसी और के पास भेज दिया, जिसे राह दिखाने वाला कोई नहीं था, जिसने कॉलेज के 6 महीने बाद कॉलेज छोड़ दिया, आज विश्व भर में कंप्यूटर के क्रांतिकारी कहलाते हैं । इन्होंने ही कंप्यूटर को एक नयी पहचान दीं ।जी हाँ! हम Steve jobs की ही बात कर रहे है, आज यहाँ हम उनके जीवन के बारे में विस्तार से बात करेंगे और आपको बताएँगे की कैसे उन्होंने संघर्ष Struggle  करते – करते Apple company स्थापित करी और कैसे वे दुनिया के महानतम सफल इंसान बने ।तो आइये जानते है कम्प्यूटर जगत के क्रांतिकारी Steve Jobs की Biography Hindi में ।

Steve Paul Jobs का जन्म 24 फरवरी 1955 में कैलिफ़ोर्निया (California) के सैन फ्रांसिस्को (San Francisco) में हुआ । जन्म के बाद Steve को किसी को गोद देने का फैसला किया गया । स्टीव को गोद लेने के लिए पहले जिस जोड़े का चुनाव किया गया था वे पढ़े लिखे और अमीर थे लेकिन अचानक उन्हें लड़के की जगह लड़की को गोद लेने की इच्छा हुई ।
इसके बाद Steve को Paul और Clara ने गोद लिया । Steve की असली माँ चाहती थी की उनके बेटे को एक शिक्षित परिवार मिले लेकिन Paul थे मैकेनिक और Clara थी अकाउंटेंट और दोनों ने ही कॉलेज पूरी नहीं की थी पर Clara, अब Steve की माँ ने उनकी असली माँ से वादा किया की वह कैसे भी Steve को कॉलेज पढ़ाएंगी ही ।
Educationअब Steve को अपना नया परिवार मिल गया था जो 1961 में कैलिफ़ोर्निया (California) के माउंटेन व्यू (Mountain View) में रहने आ गये । यही से उनकी पढ़ाई शुरू हुई ।
Steve jobs के पिता ने घर चलाने के लिए एक गेराज खोल लिया और वही से शुरू हुई Steve और इलेक्ट्रॉनिक का सफ़र । Steve इलेक्ट्रॉनिक के साथ छेड़-छाड़ करने लगे और ये उन्हें भाने लगा । वो किसी चीज़ को पहले तोड़ते और फिर जोड़ते थे ।
Steve jobs यूं तो होशियार थे पर उन्हें स्कूल जाना पसंद नहीं था । ज़्यादातर स्कूल में वे शरारते ही किया करते पर दिमाग तेज़ होने के कारण शिक्षकों ने उन्हें समय से पहले ही ऊंची कक्षा में पहुँचाने की बात की पर Steve के माता पिता ने मना कर दिया ।
13 साल की उम्र में उनकी मुलाकात हुई steve wozniak से हुई । Wozniak का दिमाग भी काफ़ी तेज़ था और उन्हें भी इलेक्ट्रॉनिक से बहुत प्यार था शायद इसीलिए दोनों में जल्द ही दोस्ती हो गयी ।
हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी होने पर Steve का दाखिला हुआ रीड कॉलेज में, जिसकी फ़ीस बहुत ज़्यादा थी और Steve के माता-पिता बड़ी मुश्किल से खर्चा चला रहें थें । जल्द ही उन्हें एहसास हुआ की पढ़ाई में उनका मन नहीं लग रहा है और माता-पिता के पैसे भी बर्बाद हो रहे है इसलिए Steve ने फैसला किया की वे कॉलेज छोड़ देंगे ।
शायद उनकी पूरी शिक्षा में से सिर्फ़ Calligraphy काम आई क्योंकि आज जो हमें कंप्यूटर में इतने फोंट्स (Fonts) में लिखते हैं वो इन्हीं के बदौलत है । कभी-कभी वो सारी चीज़ें काम न आकर वो एक चीज़ काम आती है जिसे हमने सबसे कम ध्यान दिया था ।

Struggle
कॉलेज छोड़ने के बाद Steve ने अपने रूचि के अनुसार एक Calligraphy क्लास जाने लगे । ये एक ऐसा समय था जब Steve के पास बिलकुल पैसे नहीं थे, वे अपने दोस्त के कमरे में फर्श पर सोते थे, कोका-कोला की बोतलें बेचकर खाना खाते थें और हर रविवार सात मील चलके मंदिर जाते थे मुफ़्त में पेट भर खाना खाने ।

1972 में Steve jobs ने अटारी नाम के वीडियो गेम कंपनी में काम करना शुरू किया । कुछ समय बाद इनका यहाँ भी मन नहीं लगा और कुछ पैसे इकट्ठा करके वे 1974 में भारत चले गये, घूमने । भारत में वे सात महीने रहें और बौध धर्म को पढ़ा और समझा । इसके बाद वे अमेरिका वापस चले आये और फिर से अटारी कंपनी में काम करने लगे और अपने माता-पिता के साथ रहने लगे ।


Steve jobs और Steve wozniak एक बार फिर अच्छे दोस्त बन गए । दोनों ने मिलकर काम करने का सोचा । और जहाँ दोनों की रूचि इलेक्ट्रॉनिक में थी कंप्यूटर बनाना उनके लिए सही फैसला था ।
Wozniak हमेशा से ही कंप्यूटर में रूचि रखते थे तो उन्होंने एक कंप्यूटर बनाया जिसे नाम दिया गया ‘Apple’Steve के पापा के छोटे से गेराज में, दोनों ने अपना अपना कुछ सामान बेचकर पैसे इकट्ठे किये और अपने जुनून को हकीक़त में बदला । और जब ये सबकुछ हो रहा था, Steve की उम्र मात्र 21 थी ।
Apple कंप्यूटर को छोटा, सस्ता और ज़्यादा क्रियाशील (Functional) बनाया । उनके टेक्नोलॉजी को क्रेताओं ने इतना पसंद किया कि दोनों ने मिलकर कई लाख डॉलर कमाये । दोनों का पहला आविष्कार या यूँ कहें पहली प्रमोचन (Launch) थी Apple I जिसने $774,000 कमाया उसके 3 साल बाद प्रमोचन हुआ Apple II का, जिसने बिक्री को 700 प्रतिशत बढ़ा दिया और वो हो गया $139 बिलियन ।
10 साल में ‘Apple’ एक जानी मानी कंपनी बन गयी जो बिलियन डॉलर्स कमाने लगी लेकिन जैसे ही Apple III और Lisa का प्रमोचन हुआ, लोगों ने इन दोनों को ज़्यादा नहीं सराहा । फलस्वरूप कंपनी को घाटा हुआ, बहुत घाटा । दुर्भाग्य से, इसका ज़िम्मेदार Steve को ठहराया गया और 17 सितम्बर 1985 में, कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर ने Steve को कंपनी से निकल दिया ।
Apple कंपनी से निकले जाने पर वे टूट चुके थे, असफलता उन्हें खाए जा रही थी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी । उन्होंने सोचा की: इस तरह से हार मान लेने से तो मैं टूट जाऊंगा और मैं कुछ भी नहीं करूँ पाउँगा, इससे तो बेहतर है कि मैं एक नई शुरुआत कर दूं । इस वक़्त अगर इनके दिमाग में ये बात नहीं घुसती तो शायद आज हमें हमारा Steve Jobs नहीं मिलता ।
Steve jobs यह जानते थे की कंप्यूटर बनाना उनसे अच्छा कोई नहीं जानता तो क्यों न एक नयी शुरुआत की जाए । तब Steve ने Next नाम की कंपनी खोली जिसका पहला प्रोडक्ट ‘हाई एंड पर्सनल कंप्यूटर था’ पर बात कुछ बनी नहीं क्योंकि Apple और Lisa ने पहले ही मार्केट घेर रखा था पर Steve भी हार मानने वालों में से नहीं थे, उन्होंने अपने कंपनी को एक सॉफ्टवेयर कंपनी में बदल दिया ।
उसके बाद तो मानो Steve jobs के भाग्य ही खुल गये । उनकी कंपनी ने इतने पैसे कमाए की 1986 में Steve ने 10 मिलियन डॉलर से एक ग्राफिक्स कंपनी खरीदी और उसका नाम रखा Pixar । इसके बाद Steve ने ज़िन्दगी में पीछे मुड़कर नहीं देखा । Pixar जब Disney के साथ मिल गया तो इस कंपनी ने सफलता के सातवें आसमान को छू लिया ।
इधर Apple कंपनी का घाटा चल रहा था तो Apple ने 477 मिलियन डॉलर से Next को खरीद लिया और Steve jobs बन गए Apple के सी.ई.ओ. ये वही समय था जब Apple ने अनोखे प्रोडक्ट निकाले जैसे आईपॉड और 2007 में Apple का पहला मोबाइल फ़ोन निकला जिसने मोबाइल फ़ोन के बाज़ार में क्रांति फैला दी । वो फ़ोन तो माने हाथों हाथ बिक गयी और Steve jobs बन गए स्टार ।
खुशियाँ और सफलता Success के बीच न जाने कब उन्हें कैंसर जैसी बीमारी हो गयी जिसका पता चला अक्टूबर 2003 में । जुलाई 2004 में उनकी पहली सर्जरी हुई । बात बिगड़ते- बिगड़ते इतनी बिगड़ गई की अप्रैल 2009 मे उनका लीवर ट्रांसप्लांट हुआ और 5 अक्टूबर 2011 में उन्होंने अपनी आखिरी सांस लीं ।
तो ये थी एक महान हस्ती की संक्षिप्त जीवनी (Biography) । हमने इसे छोटा ही रखा ताकि पाठकों को लाभदायक अंश पढ़ने का मौका मिले । उम्मीद है आपने Steve Jobs की Biography से कुछ सीख लिए होंगे ।
आप अपना अनुभव नीचे कमेंट करके बता सकते हैं । अगर कोई कमी रह गयी हो तो उसे भी बेझिझक बता सकतें हैं ताकि हमारे भविष्य के पोस्ट बेहतर हो । आखिर में, अगर आपको ये पोस्ट लाभदायक लगा हो तो अपने दोस्तों के साथ इसे शेयर करना न भूले। धन्यवाद!

Sunday, 18 February 2018

भारत के बारे में कुछ रोचक तथ्य

हैलो दोस्तों
आज में इस पोस्ट के जरिये बताऊंगा की हमारे भारत देश के बारे में कुछ रोचक बाते जो आज तक आपने          शायद ही कभी पढ़ी या सुनी होगी।तो फिर चलिए जानते है अपने भारत देश के बारे में कुछ नया.
भारत देश का इतिहास बहूत पुराना हैं। हमारा भारत देश बहुत ही विविधताओं से भरा हैं। वैसेही बहुत से रोचक तथ्ये भी हैं। आज हम यहाँ भारत के बारे में कुछ रोचक तथ्य – Interesting Facts about India जानने जिन्हें पढ़कर आप हैरान हो जाओंगे।


5. दुनिया में किसी भी देश से ज्यादा मस्जिद (3,00,000) भारत में है।

6. और साथ ही भारत दुनिया का तीसरा सर्वाधिक मुस्लिम जनसँख्या वाला देश है।

7. तक्षिला को दुनियाँ को पहली यूनिवर्सिटी कहा जाता है, इसकी शुरुवात तक़रीबन 700 BC में की गयी।

8. भारत में दुनिया की सबसे ज्यादा इंग्लिश बोलने वाली जनसँख्या है।

9. आकलन के अनुसार, दुनिया की कुल जनसँख्या के तक़रीबन 25% कर्मचारी आने वाले कुछ वर्षो में भारत से ही होंगे।

10. इंग्लिश एक्टर सर बेन किंग्सले का जन्म नाम कृष्णा पंडित भांजी है और वे भारतीय मूल के है।

11. महाराष्ट्र के खारे पानी का लोणार सरोवर पृथ्वी से टकराये हुए उल्का से बना है और यह अपने स्वरुप के सबसे प्रसिद्ध सरोवरों में से एक है।

12. 1986 तक, भारत एकमात्र ऐसा देश था जहाँ अधिकारिक रूप से डायमंड की खोज की गयी थी।

13. भारत में सभी डॉलफिन की बंदी है, क्योकि भारत में इसे अमानवीय रूप से देखा जाता है।

14. भारत की तकनिकी राजधानी बंगलौर ने 2006 में अपने कार्यालय की आपूर्ति को छः गुना बढ़ा दिया था और वर्तमान में यहाँ सिंगापुर से भी ज्यादा ग्रेड – A ऑफिसर है।

15. भारत दुनिया में फिल्मो का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर है।

16. भारत दुनिया में दूध उत्पादित करने वाला सबसे बड़ा देश है।

17. भारत ने सर्वाधिक मर्डर की संख्या में सभी देशो को पीछे छोड़ दिया, भारत में हर साल सर्वाधिक मर्डर (32,719) होते है, दुसरे पायदान पर रशिया है, जहाँ हर साल 28,904 मर्डर होते है।

18. दो प्रमुख धर्म, बुद्ध और जैन धर्म की स्थापना भारत में ही हुई है।

19. तक़रीबन 17 वी शताब्दी तक, भारत दुनिया का सबसे समृद्ध देश था।

20. आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

21. सुपरकंप्यूटर बनाने वाले भारत मुख्य तीन देशो में से एक है। (दुसरे दो देशो में यूनाइटेड स्टेट और जापान का समावेश है।)

22. दुनिया का सबसे बड़ा रोड तंत्र भारत में ही है – हमारे देश में तक़रीबन 1.9 मिलियन मिल तक रोड बन चुके है।

23. चाय भारत का राष्ट्रिय पेय है।

24. भारत में हर साल तक़रीबन 1.2 मिलियन टन आम की पैदावार होती है, जिसका वजन तक़रीबन 8000 नीली व्हेल के बराबर होंगा।

25. भारत का मेघालय राज्य दुनिया का सबसे नम राज्य है।

26. भारत ने ही दुनिया को योगा दिया है, जिसका अस्तित्व तक़रीबन 5000 सालो से है।

27. 26 मई का दिन स्विट्ज़रलैंड में हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की याद में विज्ञान दिवस के नाम से मनाया जाता है, क्योकि इस दिन कलाम ने इस देश का भ्रमण किया था।

28. मार्शल आर्ट्स को भी भारत में ही बनाया गया।

Thursday, 15 February 2018

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

हैलो दोस्तो
         आज मैं आपको एक ऐसे महान इंसान के बारे में बताने जा रहा हु.जिनकी महानता की कोई सीमा नहीं है.जिन्होंने अपनी Society के लिए अपनी family की भी परवाह नहीं की,और अपने देश के उन् नागरिको को वो मानव अधिकार दिलाये जो उन्हें पहले कभी नहीं मिले थे। 20वीं शताब्दी के श्रेष्ठ चिन्तक, ओजस्वी लेखक, तथा यशस्वी वक्ता एवं freedom india के प्रथम कानून मंत्री Dr.B R Ambedkar indian constitution के प्रमुख निर्माणकर्ता हैं। विधि विशेषज्ञ, अथक परिश्रमी एवं उत्कृष्ट कौशल के धनी व उदारवादी, परन्तु सुदृण व्यक्ति के रूप में डॉ. आंबेडकर ने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक भी माना जाता है
छुआ-छूत का प्रभाव जब सारे देश में फैला हुआ था, उन दिनों ही 14 अप्रैल, 1891 को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ था। बचपन से ही बाबा साहेब ने छुआ-छूत को महसूस किया था । जाति के कारण उन्हें संस्कृत भाषा पढने से वंचित रहना पड़ा था। कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ ने भीमराव जी को High Education  के लिए  तीन साल तक scholarship  प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की america  से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने columbia university  से पहले M.A  तथा बाद में Ph.D  की डिग्री प्राप्त की ।उनके research  का विषय “भारत का राष्ट्रीय लाभ” था। इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी scholarship  एक वर्ष के लिये और बढा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे high Post  दिया गया किन्तु कुछ Social  ironically की वजह से एवं आवासिय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङकर बम्बई जाना पङा। बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ Narrow thinking  के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङा। इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढते रहे। उनका दृण विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुनः लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे।

1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धी में चार चाँद लग गया।

डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी। वह इसे मानव की एक पद्धति (Way of Life) मानते थे। उनकी दृष्टी में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य “समाज की आन्तरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।“ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- “किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।“

अनेक कष्टों को सहन करते हुए, अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को “प्रारूप-समिति” जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आंबेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण उनके द्वारा बङी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणाम स्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।

1948 में बाबा साहेब diabetes  से पीड़ित हो गए । जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से भी ग्रस्त रहे । अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर इह लोक त्यागकर परलोक सिधार गये। 7 दिसंबर को बौद्ध शैली के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता , धन्य है वो भारत भूमि जिसने ऐसे महान सपूत को जन्म दिया ।
जय भीम जय भारत

शिवम् सागर 


Wednesday, 14 February 2018

उत्तर प्रदेश के जल में “आर्सेनिक” का जहर.


 हैलो दोस्तों 
           एक तरफ हम विश्व जल दिवस (22 मार्च) मनाने की तैयारी कर रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी लक्ष्य घोषित किए जा रहे हैं, लोगों को साफ सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने के जितने प्रयास किए जा रहे हैं वहीं ऐसा लगता है कि मंजिल कोसों दूर होती जा रही है। हाल में मिलने वाली खबरें कुछ ऐसे ही खतरे का संकेत दे रहीं हैं।हाल ही में यूनिसेफ की मदद से उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सर्वे करवाया, जिसमें उत्तर प्रदेश के बीस से अधिक जिलों का भूजल “आर्सेनिक” प्रदूषित पाया गया है। सर्वे की प्राथमिक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 31 जिले और ऐसे हैं जहाँ यह खतरा हो सकता है, हालांकि उनकी विस्तृत जानकारी अभी सामने आना बाकी है। चौंकाने वाली यह खबर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद ने विधानसभा में दी। हिन्दू महासभा के सदस्य राधामोहन अग्रवाल के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रसाद ने बताया कि यूनिसेफ द्वारा यह अध्ययन प्रदेश के 20 जिलों के 322 विकासखण्डों में किया गया, जहां आर्सेनिक अपनी मान्य मात्रा 0.05 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से कहीं अधिक पाया गया है।डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार पानी में आर्सेनिक की मात्रा प्रति अरब 10 पार्ट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए या प्रति लीटर में 0.05 माइक्रोग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन शोध बताते हैं कि यह इन क्षेत्रों में 100-150 पार्ट प्रति बिलियन तक पानी में आर्सेनिक पहुंच चुका है। बलिया और लखीमपुर जिले सबसे अधिक प्रभावित पाये गये। एहतिहात के तौर पर सैकड़ों की संख्या में हैण्डपम्प सील कर दिये गये हैं। बहराईच, चन्दौली, गाज़ीपुर, गोरखपुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, सन्त कबीर नगर, उन्नाव, बरेली और मुरादाबाद, जिलों में भी आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई है, जबकि रायबरेली, मिर्ज़ापुर, बिजनौर, मेरठ, सन्त रविदास नगर, सहारनपुर और गोण्डा आंशिक रूप से प्रभावित जिले हैं ।मथुरा में बैराज के कारण यमुना का रुका जल स्थानीय भू गर्भ के लिए खतरा बन रहा है तो मथुरा के आसपास के कुछ स्थानों पर बोरिंग के दौरान लाल रंग का पानी निकलने लगा है।
दिल्ली के मेडिकल संस्थान एम्स की जांच आख्या के अनुसार दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में दो सौ किलोमीटर के दायरे में आर्सेनिक का एंडमिक क्षेत्र विकसित हो रहा है। इस क्षेत्र को आर्सेनिक के मामले में विश्व के दो सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक कहा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इसका एक कारण बांग्लादेश से आने वाली गहरी अंत: नलिका तो है ही, गोकुल बैराज से भी जो जल जमीन के नीचे जा रहा है, वह भयंकर रूप से आर्सेनिक को अपने साथ भू गर्भ में ले जा रहा है। यमुना जल में भारी मात्रा में केमिकल कचरा तथा ब‌र्स्ट बोरिंग इसका दूसरा बड़ा कारण माना जा रहा है।

बिहार में तो पटना सहित 12 जिलों के लोग आर्सेनिक युक्त जहरीला पानी पाने के लिए मजबूर हैं। आर्सेनिक युक्त पेयजल के कारण गैंग्रीन, आंत, लीवर, किडनी और मूत्राशय के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो रही हैं। राज्य के जन स्वास्थ्य और अभियंत्रण विभाग के मंत्री प्रेम कुमार के अनुसार, “गंगा के किनारे रहने वाले 1,20,000 लोगों के जीवन को आर्सेनिक युक्त भू-जल से खतरा है”। केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश यादव बताते हैं कि कानपुर से आगे बढ़ने पर गंगा में आर्सेनिक का जहर घुलना शुरू हो जाता है। कानपुर से लेकर बनारस, आरा, भोजपुर, पटना, मुंगेर, फर्रुखा तथा पश्चिम बंगाल तक के कई शहरों में गंगा के दोनों तटों पर बसी आबादी में आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं।

पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक का कहर सबसे भयानक है, करीब 70 लाख लोग बीमारियों की चपेट में आ गए हैं। लगभग 20 जिले आर्सेनिक प्रभावित हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी है कि जल को शुद्ध किए बगैर पीने के लिए उपयोग में नहीं लाया जाए।

सरकार इस खतरे से निपटने के लिये काम कर रही है और इससे समु्चित ढंग से निपटा जायेगा, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री कहते हैं। वे बताते हैं कि उत्तरप्रदेश जल निगम के अधिकारियों, केन्द्रीय भूजल बोर्ड, यूनिसेफ़, इंडस्ट्रियल टॉक्सिकोलोजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट लखनऊ, CSM मेडीकल यूनिवर्सिटी और आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों की एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया था जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। मंत्री जी ने खुलासा किया कि टास्क फ़ोर्स द्वारा सुझाये गये सभी उपायों पर तत्परता से अमल किया जा रहा है और जनता को आर्सेनिक संदूषित पानी के खतरों के बारे में आगाह किया जा रहा है और साथ ही लोगों से अपील की जा रही है कि वे इस पानी का उपयोग पीने के लिये न करें। विभिन्न इलाकों में खतरे की सम्भावना वाले हैण्डपम्पों पर लाल ‘X’ का निशान लगाया जा रहा है ताकि उसका पानी लोग उपयोग न करें, इसी प्रकार कुछ अन्य जिलों में गहरे हैण्डपम्प खुदवाये जा रहे हैं। बलिया जिले में तो जगह- जगह बोर्ड लगाकर हिदायत दी जा रही है है कि यहां का पानी पीना मना है! और साथ ही गंगा किनारे के गांवों के 117 हैंड पंपों पर लाल निशान लगाए गये हैं। आर्सेनिक के खतरे

आर्सेनिक के जहर वाला पानी नमकीन हो जाता है। अगर आर्सेनिक मिले पानी को लंबे समय तक पिया जाए तो इससे कई भयंकर बीमारियां होनी शुरू हो जाती हैं। पानी में घुलित आर्सेनिक कैंसर के कई रूप, त्वचा कैंसर और किडनी फेल होने जैसी बीमारियों का कारक है। मथुरा के शंकर कैंसर चिकित्सालय के डॉ. दीपक शर्मा के अनुसार आर्सेनिक के प्रभाव से गाल ब्लैडर में कैंसर हो सकता है। वृंदावन पैलिएटिक केयर सेंटर के डॉ. संजय पिशारोड़ी के अनुसार आर्सेनिक और नाइट्रेट के कारण मनुष्य का इम्यून सिस्टम प्रभावित होता है। इससे समय से पहले वृद्धावस्था के लक्षण नजर आते हैं। इम्यून सिस्टम प्रभावित होने पर मस्तिष्क में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। आर्सेनिक से टाइप दो की डायबिटीज का भी खतरा बढ़ जाता है।

आर्सेनिक से प्रदूषित जल के सेवन से धमनियों से संबंधित बीमारियाँ होने और परिणामस्वरूप दिल का दौरा पड़ने और पक्षाघात के ख़तरे बढ़ जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होंने शरीर में आर्सेनिक के निरंतर प्रवेश का मस्तिष्क से जुड़ी धमनियों में सिकुड़न और अलीचलेपन से प्रत्यक्ष संबंध पाया है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में छपी अनुसंधान रिपोर्ट में आर्सेनिक और कई जल अशुद्धियों को रक्तवाहनियों से जुड़े रोगों का कारण बताया गया है। बांग्लादेश और चीन सहित दुनिया के विभिन्न देशों में चट्टानों में आर्सेनिक की मात्रा पाई जाती है। लंबे समय तक आर्सेनिक प्रदूषित जल के सेवन से त्वचा संबंधी बीमारियाँ भी होती हैं, लेकिन कपड़े धोने या स्नान के लिए इस जल का उपयोग ख़तरनाक नहीं माना जाता है।

आर्सेनिक से मुक्ति का उपायः

आर्सेनिक युक्त जल को अगर खुली धूप में 12-14 घंटे तक रख दिया जाए तो उसमें से 50 फीसदी आर्सेनिक उड़ जाता है। उसके बाद उस जल का इस्तेमाल पेयजल के रूप में किया जा सकता है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के तहत बंगाल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ने कम्युनिटी एक्टिव एलुमिना फिल्टर का निर्माण भी किया है जो पानी से आर्सेनिक निकालने में मददगार साबित हो सकता है।

वहीं राष्ट्रीय वनस्पति शोध संस्थान के वैज्ञानिक भी इस समस्या से निजात दिलाने के रास्ते खोज रहे हैं संस्थान के वैज्ञानिकों ने उस जीन का पता लगा लिया है जो सिंचाई के बाद आर्सेनिक के स्तर को कम करने के साथ साथ उसे अनाज व सब्जियों में पहुंचने से रोकेगा। इस शोधकार्य में महती भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक डॉ. देवाषीश चक्रवर्ती ने कहा, “यह शोध प्लांट डिदेंस मैकेनिज्म को आधार बनाकर किया गया है”।

ब्रिटेन के बेलफास्ट स्थित क्वींस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी ऐसी किफायती तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिससे आर्सेनिक संदूषित जल की समस्या से निजात मिल सकती है। इस परियोजना के समन्वयक भास्कर सेनगुप्ता ने कहा,"क्वींस के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल, इस्तेमाल में सरल, किफायती और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराई जा सकने वाली दुनिया की एकमात्र तकनीक है।" यह तकनीक आर्सेनिक संदूषित भूमिगत जल के एक हिस्से को पारगम्य पत्थरों में रिचार्जिग पर आधारित है। इन पत्थरों में जल धारण करने की क्षमता होती है। यह तकनीक भूमिगत जल में ऑक्सीजन स्तर को बढ़ा देती है और मिट्टी से आर्सेनिक निकलने की प्रक्रिया धीमी कर देती है। इस तकनीक से पानी में आर्सेनिक की मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है।

इस तरह के वैज्ञानिक दावों से उम्मीद की डोर तो बांधी जा सकती है, पर पानी के प्रति सरकारों और पानी के संगठनों को जिम्मेदारी थोड़ा ईमानदारी से निभानी होगी, तभी शायद कोई रास्ता निकले . . .

तीन कहानियाँ- जो बदल सकती हैं आपकी ज़िन्दगी !

मेरे प्यारे दोस्तों             पढ़िए iPod और iPhone बनाने वाली कंपनी Apple के founder Steve Jobs के जीवन की तीन कहानियां जो बदल सकती हैं...